‘पृथ्वी के असंख्य घाव’  गिनता अकेला आदमी

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…..यह हमारी सोच की एक अनपहचानी सीमा है

नहीं समझते हम

कि अकेला आदमी जब सचमुच अकेला होता है

तो वह गिन रहा होता है

पृथ्वी के असंख्य घाव

और उनके विरेचन के लिए

कोई अभूतपूर्व लेप तैयार कर रहा होता है।

(अकेला आदमी – विमलेश त्रिपाठी)

कालजयी रचनाएं समय स्थान की सीमाओं को लांघ कर किस तरह आप को अपनी लगने लगती हैं, इसको बयां करना मुश्किल है।

हान्स क्रिश्चन एंडरसन (2 अप्रैल 1805- 4 अगस्त 1875) महान डैनिश लेखक – जिन्होंने नाटकों, यात्रा वृत्तांतों , उपन्यासों और कविताओं के रूप में प्रचुर लेखन किया – अपनी परिकथाओं के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। उनकी परिकथाएं नौ खंडों में प्रकाशित हुई हैं और दुनिया की 125 जुबां में अनूदित भी हुई हैं।

उनकी एक ऐसी अदभुत रचना है ‘राजा के नए कपड़े’ – जिसे हम ‘निर्वस्त्र राजा’ के तौर पर अधिक जानते हैं।

जब जब किसी मुल्क में अधिनायकवाद की हवाएं चलने लगती हैं, और लोगों पर अधिनायक की अजेयता का जादू सर चढ़ कर बोलने लगता है और उसके खिलाफ बोलना भी कुफ्र में शुमार किया जाने लगता है, यह कहानी नए सिरेसे मौजूं हो जाती है।

विशाल जुलूस में निर्वस्त्र निकल पड़ा राजा, जो कथित तौर पर जादूई वस्त्र पहना है – जिन्हें देख कर अधिकतर लोग खूप गुणगान किए जा रहे हैं – और उसकी सच्चाई को बतानेवाले उस नन्हे बच्चे का रूपक आज भी मन को मोहित करता रहता है।

एक संवेदनशील, न्यायप्रिय व्यक्ति को अन्दर ही अन्दर ताकत देता रहता है।

ऐसी ही एक अन्य रचना है ‘Enemy of the People ’ (जनता का दुश्मन,1882 ) जिस नाटक की रचना नॉर्वे के महान नाटककार हेनरिक इब्सेन (20 मार्च 1928 –  23 मई 1906 )ने की थी। बताया जाता है कि शेक्सपीयर के बाद दुनिया भर में इन्हीं के नाटक आज भी खेले जाते हैं। नाटक का प्रमुख सन्देश यही है कि एक व्यक्ति, जो अकेला खड़ा रहता है, वह जनता की भीड़ से अधिक ‘‘सही’’ होता है। अपने दौर की उस धारणा को कि समुदाय/समाज बहुत महान संस्था है और जिस पर भरोसा किया जाना चाहिए उसी को वह चुनौती देता है।

नाटक का फोकस एक डॉक्टर पर है- जिनका नाम डॉक्टर स्टोकमैन है – जो किसी सैरगाह के ठिकाने पर तैनात है और वह सार्वजनिक स्नान स्थल – जो टूरिस्टों के जबरदस्त आकर्षण का केन्द्र है – कुछ खामी देखता है। डॉक्टर को पता चलता है कि वहां  पहुंच रहा पानी स्थानीय टैनरी से प्रदूषित हो रहा है, जो लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर डाल सकता है। वह इस बात को प्रशासन के निगाह में लाता है और उम्मीद करता है कि उसे इस खुलासे के लिए सम्मानित किया जाएगा, लेकिन स्थानीय आबादी उसे ही ‘‘जनता का दुश्मन’’ घोषित करती है और उसके घर पर पथराव तक करती है। उन्हें लगता है कि अगर इस बात का खुलासा होगा तो नगर में आने वाले तमाम पर्यटक यहां से हमेशा के लिए मुंह मोड़ लेंगे और नगरवासियों की आमदनी खतम हो जाएगी।

नाटक का अन्त डाक्टर के पूरे अलगाव में होता है।

यह एक तरह से नगर पर आनेवाली भयानक आपदा का खतरनाक संकेत भी है। अलबत्ता वह घोषित करता है कि वह नगर नहीं छोड़ेगा और लोगों को यह समझाने की कोशिश करेगा कि ‘‘ मुनाफे का आकर्षण किस तरह मनुष्य की नैतिकता और न्याय की समझदारी को सर के बल खड़ा कर देता है।’’(“that considerations of expediency turn morality and justice upside down.”)
नाटक के आखिरी संवाद में डा स्टोकमैन अपने आप को दुनिया का सबसे मजबूत शख्स घोषित करता है।

अपनी रचना के 140 साल बाद भी यह नाटक अलग अलग परिवेशों में, अलग अलग जुबानों एवं रूपों में में आज भी खेला जा रहा है और किसी न किसी रूप में लोगों के दिलों के तार को झकझोर रहा है।

20 वीं सदी के मध्य में आर्थर मिलर ने इस नाटक को अंग्रेजी में रूपांतरित किया, नाटक इतना कामयाब हुआ कि इस पर एक फिल्म भी बनी और बाद में 80 के दशक में उसमें एक टीवी सीरियल भी रचा गया।

महान फिल्मकार सत्यजित रॉय ने 1989 में एक फिल्म बनाई थी ‘गणशत्रु ‘ जो इसी पर आधारित थी। नाटक में डॉक्टर की भूमिका सौमित्रा चटर्जी ने की थी।

 इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई के शुरूआत में इस नाटक का एक अरबी रूपांतरण मिस्त्र में भी खेला गया। यह वही समय था जब मिस्त्र जबरदस्त सामाजिक उथलपुथल से गुजर रहा था, जिसे बाकी दुनिया अरब बसंत के नाम से जान रही थी। लम्बे समय से गददीनशीन तानाशाह होस्नी मुबारिक के खिलाफ जनता बग़ावत पर उतर आयी थी और सत्ता पलट हुआ था।

इस नाटक की इस अद्भुत यात्रा का प्रसंग चीन के जिक्र के बिना अधूरा लगेगा।

यह मशहूर है कि इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई के अंत में यह नाटक चीन में भी खेला गया। बीजिंग में इसके शो का जबरदस्त स्वागत हुआ और बाद में नानचिंग में उसके शो प्रस्तावित थे। सब पहले से तय था चूंकि नाटक खेलने आयी टीम बर्लिन के किसी नाटय समूह से ताल्लुक रखती थी। अचानक तकनीकी दिक्कत बताते हुए शो को कैन्सिल कर दिया, कोई औपचारिक वजह बतायी नहीं गयी।

अनौपचारिक हल्कों में आज भी यही समझा जाता है कि चीनी हुकूमत को यह चिंता थी ‘डा स्कोटमैन’ का प्रसंग चीन की प्रबुद्ध जनता को नए सिरेसे उद्वेलित करेगा ?

मैं अक्सर समझने की कोशिश करता हूं कि कालजयी रचना में ऐसा क्या होता है कि वह अलग परिवेश में भी मौजूं मालूम पड़ती हैं।

क्या इस वजह से कि वह मनुष्य की, व्यक्ति की अहमियत को केन्द्र में रखती हैं, कभी जिन्दगी पर कोई फलसफाना बयान देती है और बाज़ वक्त़ समाज की तमाम बन्दिशों को चुनौती देती रहती हैं ?

यही बात क्या हम चंद शख्सियतों के बारे में भी नहीं कहते !

ग़ालिब को ही देखें – जिनका इन्तक़ाल हुए 150 साल अभी बीते हैं – वह कितने समसामयिक दिखते हैं और कभी कभी तो हमारे समय से भी आगे। क्या यह इस वजह से कि वह मनुष्य की प्रधानता के बारे में बात करते हैं, जिन्दगी के बारे में  एक फलसफाना रवैया रखते हैं, और जगह जगह जमाने की बंदिशों से बग़ावत की बात करते हैं।

15 वीं सदी में कबीर की बानी में ऐसे ही कालजयी होने के तत्व बोलते हैं। एक बानी में वह बोलते हैं कि

सुखिया सब संसार है खावे और सोवै

दुखिया दास कबीर है, जागे और रोवें

ऐसा लगता है कि 15 वीं सदी के यह किसी सन्त की जुबां नहीं है बल्कि मौजूदा हालात से चिन्तित एक विचारक, एक कार्यकर्ता अपनी पीड़ा साझा कर रहा है, ‘जो घर फूंककर  साथ चलने की बात करता है।’

‘एनीमी आफ द पीपुल’ नाटक में जब पूरा नगर – इतनाही नहीं उनके कुछ आत्मीयजन – डॉ स्कोटमैन की मुखालिफत में उतर आते हैं और वह अपने आप को दुनिया का सबसे मजबूत शख्स घोषित करते हैं, तब आप चाहे न चाहें आप की निगाहें इतिहास में दूर दूर तक निकलती जाती हैं।

 आप पाते हैं कि अज्ञानी और आज्ञाकारी जनता की उन्मादी भीड़ के खिलाफ खड़े अकेले व्यक्तियों ने तो इतिहास की धारा मोड़ने के औजार गढ़े हैं, विचार दिया है।

ब्रूनो को ही देखें।

इतालवी दार्शनिक और वैज्ञानिक र्गिओडानोे ब्रूनो (जन्म 1548)जिन्हें 16 फरवरी 1600 की अलसुबह चर्च के आदेश पर रोम के चौराहे पर जिन्दा जला दिया गया था। बताया जाता है कि इनकी विद्धता एवं इनकी लोकप्रियता से चर्च इतना आतंकित था कि जलाए जाने के पहले उन्होंने ब्रूनो की जीभ भी बांध दी थी ताकि आखिरी वक्त़ में वह ऐसा कुछ न कहे कि जनता बग़ावत पर उतर आए। इसके पहले उसे आठ साल तक बन्दी बना कर रखा गया था और उस पर लम्बा मुकदमा चला था, और उस पर दबाव डाला गया था कि वह अपने विचारों से तौबा करे ; वह इस बात का प्रचार बन्द करे कि ब्रहमांड की जो अवधारणा कोपर्निकस (1473-1543) ने पेश की थी वह गलत है। वही अवधारणा कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर नहीं लगाता बल्कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है।

 आज की तारीख में साधारण विज्ञान की बात मगर बाइबल मानने वालों के लिए किसी विप्लवी बात से कम नहीं थी

कोई नहीं जानता कि ब्रूनो को जिन्दा जलाने का आदेश देने वाले चर्च के अधिकारियों नाम और न ही उस वक्त़ रोमन कैथोलिक चर्च के पोप के पद पर कौन विराजमान था, और उसको जिन्दा जलाये जाते वक्त़ जश्न की मुद्रा में खड़ी उस जनता को ।

 विचारों की हिफाजत के लिए उसकी शहादत को लोग आज भी याद करते हैं। ऐसी शहादत जिसने कोपर्निकस के क्रांतिकारी कदम की रौशनी में न केवल प्राक्रतिक विज्ञान के धर्मशास्त्र की जकड़ से मुक्ति के रास्ते को सुगम किया था बल्कि प्राकृतिक  विज्ञान के विकास के समानान्तर आधुनिक दर्शन ने भी अपने डग भरे थे। आधुनिकता का एक नया युग जनता के सामने हाजिर था, ऐसा युग जैसा पहले कभी देखा नहीं गया था।

आप समाज को देखें या विज्ञान को देखें बार बार आप इसी सबक से रूबरू होंगे कि चीज़े इसीलिए बदल सकीं जब चन्द लोगों ने, मुठठीभर समूहों ने या व्यक्तियों ने समाज की पहले से चली आ रही गति की दिशा को प्रश्नांकित किया था या विज्ञान की उपलब्ध जानकारी पर सवाल उठाए थे।

आप पाते हैं कि स्कोटमैन की जुबां से इब्सेन जो कह रहे हैं, वह सच्चाई हमारी निगाहों से अभी तक ओझल क्यों थी, क्यों हम लीक से हट कर मन में उठते खयाल तक को दफनाते हुए भीड़ की तरफ भागने के लिए हमेशा आतुर रहते हैं, वही भीड़, वही समुदाय, वही समाज, जिसके बारे में स्कोटमैन का आकलन है कि वह अज्ञानी होती है और भेड़नुमा होती है।

मार्क ट्वेन की उस चेतावनी (1935 ) को हम क्यों भूल जाते हैं :  

“Whenever you find yourself on the side of the majority, it is time to pause and reflect..’

– Mark Twain

आज हम लोग ज्योतिबा, सावित्रीबाई फुले और उनकी सहयोगिनी फातिमा शेख का नाम बहुत फक्र से लेते हैं।

लेकिन क्या यह हक़ीकत नहीं कि शेष समाज ने – उनकी कोशिशों का समर्थन करना दूर रहा, उन्हें प्रताडित किया था, यहां तक कि भिडे के मकान में बने उनके इस नवनिर्मित स्कूल में पढ़ाने जाती इन दोनों युवतियों को ताने सहने पड़ते थे और अन्य तरीकों  से परेशान किया जाता था, वहीं ज्योतिबा को अपने इन प्रयासों से रोकने के लिए रूढिवादी ताकतों ने बाकायदा सुपारी दी थी। उनके मारने के लिए हमलावर भेजा था.

गनीमत थी कि जब हमलावर रात में उन्हें मारने जा रहा था तभी अचानक ज्योतिबा की नींद खुल गयी थी और फिर जो चला वह इतिहास में दर्ज है। बाद में वही हमलावर उनके आंदोलन का कार्यकर्ता बना।

ज्योतिबा के अपने पिताजी गोविंदराव भी उनके सामाजिक कामों से खिन्न थे और इसी के चलते उन्होंने उन दोनों को घर से निकाल दिया दिया था। अगर फातिमा शेख के भाई उस्मान शेख ने इन दोनों के लिए अपने घर के दरवाजे नहीं खोले होते तो उनकी मुश्किलें और बढ़तीं।

ऐसी ही किसी जूनूनी भीड़ का शिकार बीसवीं सदी के पूर्वा़़र्द्ध में महान स्वतंत्रता सेनानी एवं पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी हुए थे। शहर में फैल रहे दंगों पर काबू पाने के लिए, वह निकल पड़े थे और 25 मार्च 1931 को कानपुर शहर की किसी गली में दंगाइयों के हाथों शहीद हुए थे। एक ऐसा शख्स जिसने हमेशा राजनीति और धर्म के मेल की मुखालिफत की थी, वह उसी सियासत का शिकार हुआ था।

‘धर्म की आड़’ नामक लेख में उन्होंने स्पष्ट किया था कि किस तरह

देश में धर्म की धूम है। उत्पात किये जाते हैं, तो धर्म और ईमान के नाम पर और जिद की जाती है, तो धर्म और ईमान के नाम पर। रमुआ पासी और बुद्धू मियाँ धर्म और ईमान को जानें, या जानें, परंतु उसके नाम पर उबल पड़ते हैं और जान लेने और जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं।’  

आज़ादी के आंदोलन में बसन्त-रजब की साझी शहादत ऐसी ही एक मिसाल पेश करती है, वह जून 1946 का वक्त़ था जब आज़ादी करीब थी, मगर साम्प्रदायिक ताकतों की सक्रियता में भी अचानक तेजी आ गयी थी और उन्हीं दिनों यह दो युवा साम्प्रदायिक ताकतों से जूझते हुए मारे गए थे।

वसंत राव हेगिश्ते का जन्म अहमदाबाद के एक मराठी परिवार में हुआ था (1906) तो रजब अली लाखानी लाहौर में पैदा हुए थे और बाद में उनका परिवार अहमदाबाद में बस गया था। हमेशा की तरह उस साल रथयात्रा निकली थी और उसी बहाने समूचे शहर का माहौल तनावपूर्ण हो चला था। इन जिगरी दोस्तों ने अपने उपर यह जिम्मा लिया कि वह अपने अपने समुदायों को समझाएंगे कि वह उन्मादी न बनें, इसी काम में वह जी जान से जुटे थे, छोटी बैठके कर रहे थें, लोगों को समझा रहे थे। 1 जुलाई को एक खांडनी शेरी के पास एक उग्र भीड़ ने – जो जूनूनी बन चुकी थी – उन्हें उनके रास्ते से हटने को कहा और उनके इन्कार करने पर उन दोनों को वहीं ढेर कर दिया गया।

.….दक्षिण के दरख्त़ एक अजीब फल देते हैं

पत्तों पर खून और जड़ में खून,

दक्षिण की हवाओं में झूलते अश्वेत शरीर

चिनार के पेड़ों से लटकते विचित्रा फल

(Southern trees bear a strange fruit,
 on the leaves and blood at the root,
Black bodies swinging in the southern breeze,
Strange fruit hanging from the poplar trees.) 

‘स्ट्रेंज फ्रूट ‘ ( Strange Fruit ) नामक बेहद मशहूर गीत का हिस्सा ; लेखन:  कम्युनिस्ट कलाकार अबेल मीरोपोल (Abel Meeropol),  गायक: बिली हालिडे ( Billi Halliday )

19 वीं सदी का उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध अमेरिका में आज भी लिंचिंग की घटनाओं के लिए याद किया जाता है।

याद रहे कि वहां अमेरिका में बमुश्किल 75 सालों में (1877-1950) श्वेत वर्चस्ववादी गिरोहों ने लगभग चार हजार अफ्रीकी अमेरिकियों की इसी तरह हत्या की जबकि वहां की हुकूमत और पुलिस ने ऐसी घटनाओं की पूरी तरह अनदेखी की थी।

 महान अमेरिकी लेखक, उपन्यासकार, कवि और एक्टिविस्ट जेम्स बाल्डविन (1924-1987) जिनके निबंधसंग्रह ‘डार्क डेज’ में इस विकसित होती हिंसा का शब्दांकन किया था, लिखा था,

‘भीड़ कभी स्वायत्त नहीं होती। वह सत्ता में बैठे लोगों की वास्तविक इच्छा को पूरा करती है।’’

वर्ष 1888 में श्वेत वर्चस्ववादियों ने किसी कुएं से पानी पीने के लिए सात अफ्रीकी अमेरिकियों की हत्या की, जो उनके हिसाब से सिर्फ, ‘श्वेतों के लिए’ था। बाल्डविन उस कहानी को दोहराते है और लिखते हैं,
‘‘इन मासूमों का खून अलाबामा राज्य के हाथों पर लगा है जिसने राज्य की इच्छा की पूर्ति के लिए इन झंुडों को सड़कों पर उतार दिया।’

अबेल मीरोपोल का लिखा और बिल हैलीडे का गाया वह गीत उन्हीं स्याह दिनों की याद दिलाता है।

दुनिया के सबसे ताकतवर कहे जाने वाले जनतंत्रा अमेरिका ने भले ही लिंचिंग से तौबा किया हो, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रा में 21 वी सदी की दूसरी दहाई के अंत में भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं को नए सिरे से ढंूढ निकाला है।

वहां अगर नस्ल का मामला हावी था तो यहां इसे अधिक व्यापक कर दिया गया है, वह कभी चतुष्पाद जानवर के नाम पर, कभी आस्था के नाम पर तो कभी किसी अफवाह के चलते भी किसी को सरेआम खत्म कर सकती है।

ज्यादा वक्फ़ा नहीं गुजरा और किसी को अब बात शायद थोड़ी पुरानी लग सकती है कि वह किसी अख़लाक के घर भी धमक सकती है, गांव के प्रार्थनास्थल से वहां गोलबंद होने के लिए जनता का आवाहन कर सकती है। और फ्रीज में रखे मीट को दिखा कर धार्मिक भावनाएं आहत होने का ऐलान कर सकती है, और वही उसे ढेर कर सकती है।

 या वह किसी उना में  गोकशी के नाम पर सरेआम दलितों की चमड़ी उधेड़ सकती है, उनका जुलूस निकाल सकती है।

या वह 15 साल का एक बच्चा (जुनैद) जो ईद की तैयारियों में खुशी मनाने घर जा रहा है, उसे सरेआम रेल के डिब्बे में पीट पीट कर मार डाल सकती है और प्लेटफार्म पर खड़ी 200 लोगों की भीड़ फिर इस बात से साफ इन्कार कर सकती है कि उसने कुछ देखा ही नहीं। और किस तरह एक मासूम की मौत को अ-घटना बना सकती है।

निश्चित यह हत्या मामूली प्रसंग नहीं है।

इंडियन एक्स्प्रेस के कौनैन शेरीफ एम फरीदाबाद के उस रेलवे स्टेशन पर लौटे थे ताकि यह जाना जाए कि आखिर जुनैद को मरते हुए किसने देखा था। उन्होंने पाया कि किसी ने भी नहीं देखा जब एक किशोर प्लेटफार्म नम्बर चार पर लहूलुहान पड़ा था। पत्रकार ने लिखा था कि खून के वह धब्बे अभी भी प्लेटफार्म पर ‘दिख’ रहे हैं और इसके बावजूद किसी ने कुछ नहीं देखा, न स्टेशन मास्टर ओम प्रकाश और न ही पोस्टमास्टर भगवत दयाल, जिनका दफतर प्लेटफार्म के उस पार है। ‘मैंने कुछ नहीं देखा’, ओम प्रकाश का कहना था। ‘मैंने कुछ नहीं देखा’ भगवत दयाल ने भी कहा। दोनों ने वही वाक्य दोहराया। यहां तक कि सीसीटीवी ने भी कुछ नहीं देखा। एक अधिकारी ने बताया कि ‘घटनास्थल के बिल्कुल सामने एक सीसीटीवी कैमरा है। वायर तोड़ दी गयी है और वह काम नहीं कर रहा है।’  

इस पूरे घटनाक्रम पर एक विदुषी/विश्लेषक ने ( Kafila.online )  लिखा था:  

.. और फिर उन्होंने सामूहिक तौर पर, बिना किसी आपसी सहमति के, जो उस घटनाक्रम को उन्होंने देखा था उसे देखने का सिलसिला शुरू किया। इस घटना का सबसे डरावना पहलू यही रहा है जिस पर वह रिपोर्ट रौशनी डालती है: अनकहे की आतंकित करने वाली ताकत, लेकिन जो सामूहिक तौर पर बंधनकारी हो, बहुसंख्या के बीच यह सहमति कि किसी मुस्लिम बच्चे के मृत शरीर को देखा जाए। उत्तर भारत के उस छोटे स्टेशन के रेलवे प्लेटफॉर्म पर बहुसंख्या ने तत्काल एक विचित्र सामाजिकता निर्मित की, लोगों के बीच एक साझा सामाजिक बंधन जो आम तौर पर एक दूसरे से परिचित नहीं थे। अजनबियों के इस परस्पर स्वीकार के बाद, इस प्लेटफॉर्म पर खड़े बहुसंख्यकों  ने मौन की इस संहिता का पालन करना तय किया जिसके जरिए आज के भारत के रेलवे प्लेटफार्म पर एक मुस्लिम बच्चे की सरेआम मौत को दो सौ लोगों द्वारा देखा नहीं गया।

इस घटना के विपरीत हम इयान ग्रिलोट ( उम्र 24 साल) की प्रतिक्रिया को देख सकते हैं, जब एक बन्दूकधारी कैन्सास (अमेरिका) के ओलाथे के एक रेस्तरां में श्रीनिवास कुचीबोतला और आलोक मुसासानी को मारने के लिए पहुंचा। (2017) ग्रिलोट ने बन्दूक की गोलियों की बौछार के बीच अपने आप को खड़ा किया और छाती पर गोलियां झेली ताकि हत्यारा अन्य लोगों को मार न सके। (गोलीबारी में जख्मी हुए कुचीबोटला ने बाद में दम तोड़ दिया।/) जब इयान ग्रिलोट का हीरो के तौर पर अभिनन्दन किया गया, उसने कहा, ‘मैंने बस वही किया जो कोई भी दूसरे मनुष्य के लिए करता। यह बात मायने नहीं रखती कि वह कहां का था या उसकी नस्लीयता क्या थी। हम सभी मनुष्य हैं। मुझे लगता है कि मैंने वही किया जो स्वाभाविक तौर पर सही बात थी।’ अगर उसने कदम नही बढ़ाया होता, उसने कहा, ‘मैंने अगर हत्यारे को रोकने की कोशिश नहीं की होती तो मेरे लिए ताउम्र वह टीस बनी रहती।’

पोर्टलेण्ड, ओरेगॉन (संयुक्त राज्य अमेरिका) में एक श्वेत आदमी ने हिजाब पहनी दो लड़कियों को देख कर नस्लवादी गालियां दी। उस ट्रेन में सवार तीन लोगों ने तत्काल हस्तक्षेप किया। दो मारे गए – रिकी जॉन बेस्ट (उम्र 53 साल) और तालिसीन मीरडिन नामकाई मेछे (उम्र 23 साल) तीसरा आदमी – मिका डेविड कोल फलेचर (उम्र 21 साल) बुरी तरह जखमी हुआ। नमकाई मेछे की मां – आशा डिलीवरन्स – ने अपने बेटे के बारे में कहा, ‘ पोर्टलेण्ड में दो मुस्लिम युवतियों को बचाने की कोशिश में मेरा लाडला कल गुजर गया। मेरा चमकता सितारा, मैं हमेशा तुमसे प्यार करूंगी।’

असावटी के प्लेटफार्म पर खडे़ दो सौ लोग ऐसे किसी नैतिक द्वंद से गुजरे नहीं थे, जिसने इयान ग्रिलोट को कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया और बेस्ट तथा नमकाई मेछे को मौत को गले लगाने की तरह बढ़ाया।

21 वीं सदी की इस तीसरी दहाई में यह दरअसल फिर एक बार भीड़ का समय है।

आज़ादी मिले पचहत्तर साल पूरा होने को हैं, लेकिन चारों तरफ एक अजीब सी बेचैनी है, अकुलाहट है।

संविधान ने भले हमें तमाम स्वतंत्राताएं मिली हों, हम बोल सकते हों, अपने हिसाब से रह सकते हों, संगठन बना सकते हों , जाति, लिंग,संप्रदाय, धर्म, नस्ल आदि तमाम आधारों पर भेदभाव से मुक्त जीवन बीता सकते हों, लेकिन संविधान में दर्ज सिद्धांतों एवं उसके मूल्यों से वास्तविक जीवन की दूरी बढ़ती जा रही है।

अब क्या खाएं, क्या पहनें, किससे बात करें, किससे सम्बन्ध बनाएं, कहां रहें, जीवन के सभी पहलुओं पर लिखित अलिखित बंदिशें लग गयी हैं।

आज से ठीक 72 साल पहले देश को संविधान सौंपते वक्त जिस किस्म के भारत के निर्माण का तसव्वुर किया गया था, जिसकी कल्पना की गयी थी, उससे बिल्कुल अलहदा पसमंज़र फिलवक्त़ हमारे सामने है।
रेखांकित करनेवाली बात यह है कि यह समाजी स्तर पर भी इसका तमेवदंदबम दिखता है।

एक के बाद एक ऐसा घटनाक्रम सामने आ रहा है कि लग रहा है कि भीड़ की हिंसा और राज्य हिंसा के बीच की दूरियां गोया समाप्त हो चली दिखती है।

अब भीड़ कहीं भी प्रगट हो सकती है।

वह धार्मिक त्यौहारों में – जबकि लोग अपनी अपनी आस्था, परंपरा के हिसाब से रस्मेें पूरी करते हैं, आत्मीयजनों के साथ सहभोज करते हैं – भी वाहनों पर हथियारों से लैस होकर निकल सकती है और सड़कों, चौराहों, गलियों में अपना शक्तिप्रदर्शन कर सकती है और यहां तक कि ‘अन्य’ धर्मीयोें, आस्थावानों को अपमानित करने का, उनके प्रार्थनास्थलों में हुडदंग करने का बहाना बना सकती है।

और अगर किसी ने अपने आप को बचाने की कोशिश की, कुछ प्रतिरोध किया तो मुमकिन है उसी शाम मध्ययुगीन न्याय को भी शर्मसार करते हुए 21 वीं सदी की नाभिकीय महाशक्ति के बुलडोजर आप के आशियाने को तबाह कर सकते हैं।

मालूम हो कि सत्ता की बागडोर जिनके हाथों में है, उनका दावा है कि यह नया इंडिया है,

21वीं सदी की तीसरी दहाई में शान के साथ हाजिर न्यू इंडिया।

उनके दावे जो भी हों अब भारत उम्मीद का गणतंत्र नहीं बल्कि डर का गणतंत्र बना है।

यह जनतंत्र के रास्ते पिछले दरवाजे से बहुसंख्यकतंत्रा का दाखिल होना है।

आज इस बात की झलक दिखती है कि ‘हम’ और ‘वे’ की यह गोलबन्दी किस मुक़ाम तक पहुंच सकती है।

‘विचार जब जनसमुदाय द्वारा ग्रहण किए जाते हैं, तब वह एक भौतिक शक्ति बन जाते हैं।’ कितनी दुरूस्त बात कही थी मार्क्स ने। अलबत्ता यह बिल्कुल विपरीत अन्दाज़ में हमारे सामने नमूदार हो रही है। जनसमुदाय उद्वेलित भी है, आन्दोलित भी है, एक भौतिक ताकत के तौर पर संगठित रूप में उपस्थित भी है, फर्क बस इतना ही है कि उसके ज़हन में मानवमुक्ति का फलसफा नहीं बल्कि ‘हम’ और ‘वे’ की वह सियासत है, जिसमें धर्मसत्ता, पूंजीसत्ता और राज्यसत्ता के अपवित्रा कहे जा सकने वाले गठबंधन के लिए लाल कालीन बिछी है। और यह सिलसिला महज दक्षिण एशिया के इस हिस्से तक सीमित नहीं है।

तय आपको करना है !

भीड़ के साथ जुड़ना है, सदियों के कथित अपमानों का बदला ‘अन्य’ घोषित किए गए जनों, समुदायों से लेना है और विजयश्री हासिल करनी है या भीड़ से जुड़ने से इन्कार करना है।

अपनी अलग राह निकालनी है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर अपनी मशहूर रचना ‘एकला चलो रे’ में इसी बात को जुबां देते हैं

‘यदि डाक सुनो कोई ना रे, तो एकला चलो एकला चलो एकला चलो रे’
(अगर तुम्हारी आवाज़ सुनने को तैयार नहीं है तो अकेले ही चल दो)

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